देशधर्म

जाति जनगणना में पुराने कानून में बदलाव की जरूरत नहीं

अंतिम बार संशोधन 1994 में

यूपी सीतापुर जनगणना करने वालों को जनता से जाति का विवरण मांगने की अनुमति देने के लिए 70 साल से अधिक पुराने अधिनियम में बदलाव की जरूरत नहीं होगी।

अधिकारियों ने बताया कि 1948 के इस कानून में अंतिम बार 1994 में संशोधन किया गया था।

 

उन्होंने कहा कि यह कानून केंद्र को जनता से विवरण मांगने का अधिकार देता है, जैसा कि फॉर्म में उल्लेख किया जा सकता है। 1881 से 1931 के बीच देश में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई जनगणना के दौरान सभी जातियों की गणना की गई

अधिकारियों के अनुसार 1948 के कानून में अंतिम बार 1994 में किया गया था संशोधन

थी, लेकिन 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना के समय तत्कालीन सरकार ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों को छोड़कर अन्य जातियों की गणना न करने का निर्णय लिया। एक दशक बाद 1961 में केंद्र ने राज्यों से कहा कि यदि वे चाहें तो स्वयं सर्वेक्षण करें और ओबीसी की राज्य-विशिष्ट सूचियां तैयार करें। अब छह दशक बाद तथा कई पक्षों और दलों की मांगों के बाद सरकार ने पिछले महीने अगली राष्ट्रव्यापी

जनगणना में जाति गणना को शामिल करने का निर्णय लिया।

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